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Thursday, March 6, 2008

ख़बरावलों की ख़बर

टीवी पत्रकारिता के सही स्वरूप के बारे में कोई भी राय बनाना बहुत मुशिकल है, लेकिन एक बात जो बिल्कुल साफ है, वो ये कि टीवी पत्रकारिता तकनीकी दबाव में कहीं गुम सी होती नज़र आ रही है। पर सबसे अहम मुद्दा इस माध्।म के पत्रकारों का है , जो संवेदनशीलता के सभी पैमानों से लगातार नीचे गिरते जा रहे हैं(कुछ चुने हुए लोगों को छोड़कर जिनसे उम्मीद अभी भी जिन्दा है)वो या तो ख़बरों की मापतौल भूल गये हैं , या अपनी आँखों पर पट्टी बाँध चुके हैं। या फिर ख़बरों का दायरा उनके लिए सीमित हो चुका है।सवाल की गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है, क्योंकी इस देश की दो तिहाई आबादी टीवी जैसे अहम माध्यम में प्रतिनिधित्व नहीं पा रही। बावजूद इसके कि इस चकमक माध्यम में काम कर रहे अधिकांश लोग इसी तबके से आते हैं।टीवी बनाम प्रिंट पत्रकारिता से जुडी तमाम बहसों में इस मुद्दे पर सिर फुट्टैव्वल तो बहुत हो चुका लेकिन हल अभी तक नज़र नही आया। अगर वर्तमान त्वरूप की बात करें तो आधुनिक टीवी पत्रकारिता लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ होना तो दूर अभी उसकी ज़मीन भी नहीं है। इस गंभीर सवाल का चिंतन किसी एक के ज़िम्मे नहीं बल्कि सभी के हिस्से है। देखना ये है कि ये बात कहाँ तक जाती है।